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अध्याय 1 — भक्तिसूत्र

भक्तिसूत्र
84 श्लोक • केवल अनुवाद
अब हम भक्ति की व्याख्या करेंगे।
वह (भक्ति) ईश्वर के प्रति परम प्रेमरूप है।
और अमृतस्वरूप (भी) है।
जिसको (परम प्रेमरूप और अमृतरूप भक्ति को) पाकर मनुष्य सिद्ध हो जाता है, अमर हो जाता है, (और) तृप्त हो जाता है।
जिसके ( प्रेमस्वरूप भक्ति के) प्राप्त होने पर मनुष्य न किसी भी वस्तु की इच्छा करता है, न शोक करता है, न द्वेष करता है, न किसी वस्तु में आसक्त होता है और न उसे (विषयभोगों की प्राप्ति में) उत्साह होता है।
जिसको (परम प्रेमरूप भक्ति को) जान (प्राप्त) कर मनुष्य उन्मत्त हो जाता है, स्तब्ध (शान्त) हो जाता है, (और) आत्माराम बन जाता है।
वह (प्रेमभक्ति) कामनायुक्त नहीं है, क्योंकि वह निरोधस्वरूप है।
लौकिक और वैदिक (समस्त) कर्मो के त्याग को निरोध कहते हैं।
उस प्रियतम भगवान में अनन्यता और उसके प्रतिकूल विषय में उदासीनता को भी निरोध कहते हैं।
(अपने प्रियतम भगवान्‌ को छोड़कर) दूसरे आश्रयों के त्याग का नाम अनन्यता है।
लौकिक और वैदिक कर्मो में भगवान्‌ के अनुकूल कर्म करना ही उसके प्रतिकूल विषय में उदासीनता है।
(विधिनिषेध से अतीत अलौकिक प्रेम-प्राप्ति करने का मन में) दृढ़ निश्चय हो जाने के बाद भी शास्त्र की रक्षा करनी चाहिये। अर्थात्‌ भगवदनुकूल शास्त्रोक्त कर्म करने चाहिये।
नहीं तो गिर जाने की सम्भावना है।
लौकिक कर्मों को भी तब तक (बाह्मज्ञान रहने तक विधिपूर्वक करना चाहिये) पर भोजनादि कार्य जब तक शरीर रहेगा तब तक होते रहेंगे।
अब नाना मतों के अनुसार उस भक्ति के लक्षण कहते हैं।
पराशरनन्दन श्रीव्यासजी के मतानुसार भगवान्‌ की पूजा आदि में अनुराग होना भक्ति है।
श्रीगर्गाचार्य के मत से भगवान्की कथा आदि में अनुराग होना ही भक्ति है।
शाण्डिल्य ऋषि के मत में आत्मरति के अविरोधी विषय में अनुराग होना ही भक्ति है।
परन्तु देवर्षि नारद के मत से अपने सब कर्मो को भगवान्‌ के अर्पण करना और भगवान्‌ का थोड़ा-सा भी विस्मरण होने में परम व्याकुल होना ही भक्ति है।
ठीक ऐसा ही है।
जैसे ब्रजगोपियों की (भक्ति)।
इस अवस्था में भी (गोपियों में) माहात्म्यज्ञान की विस्मृति का अपवाद नहीं।
उसके बिना (भगवान्‌ को भगवान्‌ जाने बिना किया जाने वाला ऐसा प्रेम) जारों के (प्रेम के) समान है।
उसमें (जार के प्रेम में) प्रियतम के सुख से सुखी होना नहीं है।
वह (प्रेमरूप भक्ति) तो कर्म, ज्ञान और योग से भी श्रेष्ठतर है।
क्योंकि (वह भक्ति) फलरूप है।
ईश्वर को भी अभिमान से द्वेषभाव है और दैन्य से प्रियभाव।
उसका (भक्ति का) साधन ज्ञान ही है, अनेक (आचार्यों) का यह मत है।
दूसरे (आचार्यों) का मत है कि भक्ति और ज्ञान परस्पर एक-दूसरे के आश्रित हैं।
ब्रह्मकुमारों के (सनत्कुमारादि और नारद के) मत से भक्ति स्वयं फलरूपा है।
राजगृह और भोजनादि में ऐसा ही देखा जाता है।
न उससे (जान लेने मात्र से ) राजा की प्रसन्नता होगी, न क्षुधा मिटेगी।
अतएवं (संसार के बन्धन से) मुक्त होने की इच्छा रखने वालों को भक्ति ही ग्रहण करनी चाहिये।
आचार्यगण उस भक्ति के साधन बतलाते हैं।
वह (भक्ति-साधन) विषयत्याग और संगत्याग से सम्पन्न होता है।
अखण्ड भजन से (भक्ति का साधन सम्पन्न होता है)।
लोकसमाज में भी भगवत्‌-गुण श्रवण और कीर्तन से (भक्ति-साधन सम्पन्न होता है)।
परन्तु (प्रेमभक्ति की प्राप्ति का साधन) मुख्यतया (प्रेमी) महापुरुषों की कृपा से अथवा भगवत्कृपा के लेशमात्र से होता है।
परन्तु महापुरुषों का संग दुर्लभ, अगम्य और अमोघ है।
उस (भगवान्‌) की कृपा से ही (महत्पुरुषों का) संग भी मिलता है।
क्योंकि भगवान में और उनके भक्त में भेद का अभाव है।
(अतएवं) उस (महत्संग) की ही साधना करो, उसी की साधना करो।
दुःसंग का सर्वथा ही त्याग करना चाहिये।
क्योंकि वह (दुःसंग) काम, क्रोध, मोह, स्मृतिभ्रंश, बुद्धिनाश एवं सर्वनाश का कारण है।
ये (काम-क्रोधादि) पहले तरंग की तरह (क्षुद्र आकार में) आकर भी (दुःसंग से विशाल) समुद्र का आकार धारण कर लेते हैं।
(प्रश्न) कौन तरता है? (दुस्तर) मायासे कौन तरता है? (उत्तर) जो सब संगों का परित्याग करता है, जो महानुभावों की सेवा करता है और जो ममतारहित होता है।
जो निर्जन स्थान में निवास करता है, जो लौकिक बन्धनों को तोड़ डालता है, जो तीनों गुणों से परे हो जाता है और जो योग तथा क्षेम का परित्याग कर देता है।
जो कर्मफल का त्याग करता है, कर्मो का भी त्याग करता है और तब सब कुछ त्यागकर जो निरद्धन्द्द हो जाता है।
जो वेदों का भी भलीभाँति परित्याग कर देता है और जो अखण्ड असीम भगवत्प्रेम प्राप्त कर लेता है।
वह तरता है, वह तरता है, वह लोकों को तार देता है।
प्रेम का स्वरूप अनिर्वचनीय है।
गूँगे के स्वाद की तरह।
किसी बिरले योग्य पात्र में (प्रेमी भक्त में) ऐसा प्रेम प्रकट भी होता है।
यह प्रेम गुणरहित है, कामनारहित है, प्रतिक्षण बढ़ता रहता है, विच्छेदरहित है, सूक्ष्म से भी सूक्ष्मतर है और अनुभवरूप है।
इस प्रेम को पाकर प्रेमी इस प्रेम को ही देखता है, प्रेम को ही सुनता है, प्रेम का ही वर्णन करता है और प्रेम का ही चिन्तन करता है।
गौणी भक्ति गुणभेद से अथवा आर्तादि भेद से तीन प्रकार की होती है।
(उनमें) उत्तर-उत्तर क्रम से पूर्व-पूर्व क्रम की भक्ति कल्याणकारिणी होती है।
अन्य सब की अपेक्षा भक्ति सुलभ है।
क्योंकि भक्ति स्वयं प्रमाणरूप है, इसके लिये अन्य प्रमाण की आवश्यकता नहीं है।
भक्ति शान्तिरूप और परमानन्दरूप है।
लोकहानि की चिन्ता (भक्त को) नहीं करनी चाहिये, क्योंकि वह (भक्त) अपने-आप को और लौकिक, वैदिक (सब प्रकार के) कर्मो को भगवान्‌ के अर्पण कर चुका है।
(परन्तु) जब तक भक्ति में सिद्धि न मिले तब तक लोकव्यवहार का त्याग नहीं करना चाहिये, किन्तु फल त्यागकर (निष्कामभाव से) उस भक्ति का साधन करना चाहिये।
स्त्री, धन, नास्तिक और वैरी का चरित्र नहीं सुनना चाहिये।
अभिमान, दम्भ आदि का त्याग करना चाहिये।
सब आचार भगवान के अर्पण कर चुकने पर यदि काम, क्रोध, अभिमानादि हो तो उन्हें भी उस (भगवान्‌) के प्रति ही करना चाहिये।
तीन (स्वामी, सेवक और सेवा) रूपों को भंग कर नित्य दासभक्ति से या नित्य कान्ताभक्ति से प्रेम ही करना चाहिये।
एकान्त (अनन्य) भक्त ही श्रेष्ठ हैं।
ऐसे अनन्य भक्त कण्ठावरोध, रोमांच और अभ्रुयुक्त नेत्रवाले होकर परस्पर सम्भाषण करते हुए अपने कुलों को और पृथ्वी को पवित्र करते हैं।
ऐसे भक्त तीर्थो को सुतीर्थ, कर्मो को सुकर्म और शास्त्रों को सत्‌-शास्त्र कर देते हैं।
(क्‍योंकि) वे तन्मय हैं।
(ऐसे भक्तों का आविर्भाव देखकर) पितरगण प्रमुदित होते हैं, देवता नाचने लगते हैं और यह पृथ्वी सनाथ हो जाती है।
उनमें (भक्तों में) जाति, विद्या, रूप, कुल, धन और क्रियादि का भेद नहीं है।
क्योंकि (भक्त सब) उनके (भगवान्‌ के) ही हैं।
(भक्त को) वाद-विवाद नहीं करना चाहिये।
क्योंकि (वाद-विवाद में) बाहुल्य का अवकाश है और वह अनियत है।
(उस प्रेमभक्ति की प्राप्ति के लिये) भक्तिशास्त्र का मनन करते रहना चाहिये और ऐसे कर्म भी करने चाहिये जिनसे भक्ति की वृद्धि हो।
सुख, दुःख, इच्छा, लाभ आदिका (पूर्ण) त्याग हो जाय ऐसे काल की बाट देखते हुए आधा क्षण भी (भजन बिना) व्यर्थ नहीं बिताना चाहिये।
(भक्ति के साधक को) अहिंसा, सत्य, शौच, दया, आस्तिकता आदि आचरणीय सदाचारों का भलीभाँति पालन करना चाहिये।
सब समय सर्वभाव से निश्चिन्त होकर (केवल) भगवान्‌ का ही भजन करना चाहिये।
वे भगवान्‌ (प्रेमपूर्वक) कीर्तित होने पर शीघ्र ही प्रकट होते हैं और भक्तों को अपना अनुभव करा देते हैं।
तीनों (कायिक, वाचिक, मानसिक) सत्यों में (अथवा तीनों कालों में सत्य भगवान्‌ की) भक्ति ही श्रेष्ठ है, भक्ति ही श्रेष्ठ है।
प्रेमरूप भक्ति एक होकर भी १ गुणमाहत्म्यासक्ति, २ रूपासक्ति, ३ पूजासक्ति, ४ स्मरणासक्ति, ५ दास्यासक्ति, ६ सख्यासक्ति, ७ कान्तासक्ति, ८ वात्सल्यासक्ति, ९ आत्मनिवेदनासक्ति, १० तनन्‍्मयतासक्ति और ११ परम विरहासक्ति - इस प्रकार से ग्यारह प्रकार की होती है।
कुमार (सनत्कुमारादि), वेदव्यास, शुकदेव, शाण्डिल्य, गर्ग, विष्णु , कौण्डिन्य, शेष, उद्धव, आरुणि, बलि, हनूमान्‌, विभीषण आदि भक्तितत्त्व के आचार्यगण लोगों की निन्दास्तुति का कुछ भी भय न कर (सब) एकमत से ऐसा ही कहते हैं (कि भक्ति ही सर्वश्रेष्ठ है)।
जो इस नारदोक्त शिवानुशासन में विश्वास और श्रद्धा करते हैं वे प्रियतम को पाते हैं, वे प्रियतम को पाते हैं।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
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