लोकह्ननौ चिन्ता न कार्या निवेदितात्मलोकवेदत्वात् ।।
लोकहानि की चिन्ता (भक्त को) नहीं करनी चाहिये, क्योंकि वह (भक्त) अपने-आप को और लौकिक, वैदिक (सब प्रकार के) कर्मो को भगवान् के अर्पण कर चुका है।
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