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भक्तिसूत्र • अध्याय 1 • श्लोक 45
तरंगायिता अपीमे संगात्समुद्रायन्ति ॥
ये (काम-क्रोधादि) पहले तरंग की तरह (क्षुद्र आकार में) आकर भी (दुःसंग से विशाल) समुद्र का आकार धारण कर लेते हैं।
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