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भक्तिसूत्र • अध्याय 1 • श्लोक 49
वेदानपि संन्यस्यति, केवलमविच्छिन्नानुरागं लभते॥
जो वेदों का भी भलीभाँति परित्याग कर देता है और जो अखण्ड असीम भगवत्प्रेम प्राप्त कर लेता है।
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