न तदसिद्धौः लोकव्यवहारो हेयः किन्तु फलत्यागस्तत्साधनं च कार्यमेव॥
(परन्तु) जब तक भक्ति में सिद्धि न मिले तब तक लोकव्यवहार का त्याग नहीं करना चाहिये, किन्तु फल त्यागकर (निष्कामभाव से) उस भक्ति का साधन करना चाहिये।
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