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भक्तिसूत्र • अध्याय 1 • श्लोक 57
उत्तरस्मादुत्तरस्मात्पूर्वपूर्वा श्रेयाय भवति॥
(उनमें) उत्तर-उत्तर क्रम से पूर्व-पूर्व क्रम की भक्ति कल्याणकारिणी होती है।
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