अध्याय 1 — आत्मोपनिषद्
आत्म
35 श्लोक • केवल अनुवाद
त्वचा, चर्म, मांस, रोम, अंगूठा, अंगुलियाँ, पीठ, मेरुदण्ड, नख, गुल्फ (टखने), उदर, नाभि, मेढ्र (जननेन्द्रिय), कटि, जंघाएँ, कपोल, कर्ण, भ्रू, ललाट, बाहुएँ, पार्श्वभाग, शिर, धमनियाँ तथा नेत्र—ये सब जो उत्पन्न होते हैं और नष्ट हो जाते हैं, वही बाह्य आत्मा (बाह्यात्मा) कहलाता है।
अब अन्तरात्मा का स्वरूप यह है—पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश; इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, कामना, मोह, विकल्प आदि; स्मृति; तथा उदात्त, अनुदात्त, ह्रस्व, दीर्घ, प्लुत, स्खलित, गर्जित, स्फुटित, मुदित, गान, वाद्य, प्रलय, जम्भाई (विजृम्भित) आदि ध्वनियों के रूप में जो प्रकट होता है;
जो सुनता है, सूँघता है, रस का अनुभव करता है, मनन करता है, जानता है, कर्म करता है; जो विज्ञानात्मा पुरुष है; तथा जो पुराण, न्याय, मीमांसा और धर्मशास्त्रों आदि के श्रवण, ग्रहण और विभिन्न प्रकार के कर्मों का अनुष्ठान करता है—वही अन्तरात्मा कहलाता है।
अब परमात्मा का स्वरूप यह है—वह अक्षर (अविनाशी) और उपासना के योग्य है। वह प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि, योग, अनुमान तथा अध्यात्म-चिन्तन के द्वारा जाना जाता है।
वह वटवृक्ष के बीज की सूक्ष्म कणिका, श्यामाक के तण्डुल (अत्यन्त सूक्ष्म धान्यकण) अथवा बाल के अग्रभाग के शत-सहस्रवें भाग से भी अधिक सूक्ष्म है। फिर भी वह इन्द्रियों द्वारा उपलब्ध नहीं होता।
वह न जन्म लेता है, न मरता है; न सूखता है, न गीला होता है; न जलता है, न कम्पित होता है; न टूटता है और न काटा जा सकता है।
वह निर्गुण, साक्षीस्वरूप, शुद्ध, निरवयव, केवल, अत्यन्त सूक्ष्म, निष्कल, निरञ्जन और निर्विकार है। वह शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध से रहित है; निर्विकल्प, निराकाङ्क्ष, सर्वव्यापी, अचिन्त्य और अवर्णनीय है।
वह अशुद्ध और अपवित्र को भी पवित्र करने वाला है। वह निष्क्रिय है; अतः उसके लिए संसार का कोई बन्धन नहीं है।
(संसार का अर्थ— संसरति इति संसारः— गतिशील या परिवर्तनशील होता है। परमात्मा एक रूप रहने वाला होने से उसका कोई समरण नहीं होता; इस भाव से उसे संसार रहित कहा गया है। अगले मन्त्रों में उस आत्म तत्व का स्वरूप दृष्टि होने पर सब जगह उस परमात्मतत्त्व-ब्रह्म के ही भासित होने की बात कही गई है।)
सत्य तो यह है कि वह परब्रह्म न तो जन्म लेता है और न ही जन्मरहित है, वह न बन्धन में रहता है, न ही साधक है, न ही वह मोक्ष की इच्छा वाला है और न ही वह मुक्त है (वह इन सबसे परे है)।
(जन्म लेने वाली काया के पास वह प्रकट होता दीखता है, इसलिए वह जन्म रहित नहीं है, लेकिन जन्म तो काया का होता है, चेतना का नहीं, पात्र बनते-दूटते हैं, उनमें रहने वाला जल तो पात्र के जन्म और क्षय से मुक्त है, इसलिए अजन्मा है। इसी भाव से उसे न मुक्त कह सकते हैं, न अमुक्त, न मोक्षाकांक्षी।)