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आत्म • अध्याय 1 • श्लोक 15
तथैव विद्वान् रमते निर्ममो निरहं सुखी। कामान्निष्कामरूपी संचरत्येकचरो मुनिः ॥
उसी प्रकार विद्वान् पुरुष भी ममतारहित (निर्मम), अहंकाररहित (निरहं) और सुखस्वरूप होकर आनन्दपूर्वक स्थित रहता है। वह कामनाओं से रहित होकर भी निष्कामस्वरूप रहता है, और एकाकी विचरण करने वाला मुनि (एकचर मुनि) बनकर संसार में विचरण करता है।
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