स्वात्मनैव सदा तुष्टः स्वयं सर्वात्मना स्थितः । निर्धनोऽपि सदा तुष्टोऽप्यसहायो महाबलः ।।
वहअपने ही आत्मस्वरूप में सदा संतुष्ट रहता है और स्वयं को सर्वात्मभाव(सबमें एक ही आत्मा का दर्शन) में स्थित अनुभव करता है।
वह धनहीन होने पर भी सदैव संतुष्ट रहता है, और बाह्य सहारे से रहित होने पर भी महाबली होता है।
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