उपाधियों(देह, मन, बुद्धि आदि आरोपित सीमाओं) के नष्ट हो जाने पर, वह ब्रह्मवेत्ता स्वयं अद्वितीय सत्-ब्रह्म ही हो जाता है। जिस प्रकार नट(शैलूष) वेश धारण करने और उसका त्याग करने पर भी वास्तव में वही व्यक्ति बना रहता है, उसी प्रकार उपाधियों के होने या न होने सेआत्मा में कोई परिवर्तन नहीं होता।
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