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आत्म • अध्याय 1 • श्लोक 25
उपाधिनाशाद्ब्रह्मैव सद्ब्रह्माप्येति निर्द्वयम्। शैलूषो वेषसद्भावाभावयोश्च यथा पुमान्॥
यह (आत्मा), उपाधि (शरीरादि) के विनष्ट हो जाने पर ब्रह्मरूप होकर ब्रह्म में विलीन हो जाता है, जिस तरह विविध वेश को धारण करने पर व्यक्ति अभिनेता आदि के रूप में समझा जाता है तथा अपने वास्तविक रूप में आ जाने पर वही (पूर्व जैसा) व्यक्ति समझा जाता है
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