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आत्म • अध्याय 1 • श्लोक 18
शरीर्यप्यशरीर्येष परिच्छिन्नोऽपि सर्वगः । अशरीरं सदा सन्तमिदं ब्रह्मविदं क्वचित्॥
वह आत्मा शरीर में रहते हुए भी अशरीरी है, वह परिच्छिन्न (शरीर में आबद्ध) रहता हुआ भी सर्वत्र गमनशील अर्थात् व्याप्त है। इसलिए शरीररहित उस ब्रह्मज्ञानी को कहीं पर भी प्रिय तथा अप्रिय ज्ञान स्पर्श नहीं करता (अर्थात् वह आत्मा किसी को प्रिय या अप्रिय नहीं समझता)।
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