न च विद्या न चाविद्या न जगच्च न चापरम्। सत्यत्वेन जगद्भानं संसारस्य प्रवर्तकम् ॥
तत्त्वदृष्टि से न तो विद्या रहती है, न अविद्या, न जगत्, और न ही कोई अन्य वस्तु। जगत् का सत्यरूप में प्रतीत होना ही संसार-चक्र के प्रवर्तन का कारण है।
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