जिस प्रकार बालकभूख और शरीर की पीड़ा को भुलाकर खेल की वस्तुओं में मग्न होकर खेलता रहता है, उसी प्रकार आत्मज्ञानी भी बाह्य दुःखों से असंग रहता है।
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