गुरु और शिष्य आदि के भेद के रूप में भी वास्तव में ब्रह्म ही प्रतीत होता है। तत्त्वदृष्टि(यथार्थ ज्ञान) होने पर केवल शुद्ध ब्रह्म ही विद्यमान रहता है।
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