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आत्म • अध्याय 1 • श्लोक 2
त्वक् चर्ममांसरोमाङ्गुष्ठाङ्गुल्यः पृष्ठवंशनखगुल्फोदरनाभिमेढ्रकट्यूरुकपोलश्रोत्र भ्रूललाटबाहुपार्श्वशिरोधमनिकाऽक्षीणि भवन्ति जायते म्रियत इत्येष बाह्यत्मा ।।
त्वचा, चर्म, मांस, रोम, अंगूठा, अंगुलियाँ, पीठ, मेरुदण्ड, नख, गुल्फ (टखने), उदर, नाभि, मेढ्र (जननेन्द्रिय), कटि, जंघाएँ, कपोल, कर्ण, भ्रू, ललाट, बाहुएँ, पार्श्वभाग, शिर, धमनियाँ तथा नेत्र—ये सब जो उत्पन्न होते हैं और नष्ट हो जाते हैं, वही बाह्य आत्मा (बाह्यात्मा) कहलाता है।
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