मूढ़ लोग, शरीर के आभास को देखकर, उस ब्रह्मज्ञानी को देहधारी समझते हैं। किन्तु वास्तव में वह देहबन्धन से मुक्त होता है। वह त्यागी हुई केंचुली के समान(अहिनिर्मोकिनीव) इस शरीर में स्थित प्रतीत होता है, परन्तु उससे सर्वथा असंग रहता है।
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