अब अन्तरात्मा का स्वरूप यह है—पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश; इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, कामना, मोह, विकल्प आदि; स्मृति; तथा उदात्त, अनुदात्त, ह्रस्व, दीर्घ, प्लुत, स्खलित, गर्जित, स्फुटित, मुदित, गान, वाद्य, प्रलय, जम्भाई(विजृम्भित) आदि ध्वनियों के रूप में जो प्रकट होता है;
जो सुनता है, सूँघता है, रस का अनुभव करता है, मनन करता है, जानता है, कर्म करता है; जो विज्ञानात्मा पुरुष है; तथा जो पुराण, न्याय, मीमांसा और धर्मशास्त्रों आदि के श्रवण, ग्रहण और विभिन्न प्रकार के कर्मों का अनुष्ठान करता है—वही अन्तरात्मा कहलाता है।
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