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आत्म • अध्याय 1 • श्लोक 13
अनात्मकमसत्तुच्छं किं नु तस्यावभासकम्। वेदशास्त्रपुराणानि भूतानि सकलान्यपि। येनार्थवन्ति तं किं नु विज्ञातारं प्रकाशयेत्॥
यह अनात्म पदार्थ, जो असत् और तुच्छ है, वह उस स्वप्रकाश तत्त्व को कैसे प्रकाशित कर सकता है? वेद, शास्त्र, पुराण, तथा समस्त भूत (सभी प्राणी और पदार्थ) जिस ज्ञाता के कारण अर्थवान् और प्रकाशित प्रतीत होते हैं, उस स्वयं प्रकाशस्वरूप ज्ञाता को भला कौन प्रकाशित कर सकता है?
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