न देशं नापि कालं वा न शुद्धिं वाप्यपेक्षते। देवदत्तोऽहमित्येतद्विज्ञानं निरपेक्षकम्॥
आत्मज्ञान न तो देश(स्थान) की अपेक्षा करता है, न काल(समय) की, और न ही बाह्य शुद्धि की। जिस प्रकार "मैं देवदत्त हूँ"—यह ज्ञान किसी अन्य अपेक्षा पर निर्भर नहीं होता, उसी प्रकार आत्मा का ज्ञान भी निरपेक्ष(स्वतः सिद्ध) होता है।
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