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आत्म • अध्याय 1 • श्लोक 11
न देशं नापि कालं वा न शुद्धिं वाप्यपेक्षते। देवदत्तोऽहमित्येतद्विज्ञानं निरपेक्षकम्॥
जिस प्रकार देवदत्त आदि नाम के प्रति विज्ञानी (पुरुष) निरपेक्ष (पूर्ण आश्वस्त)हो जाता है, उसी प्रकार वह (आत्मतत्व) देश, काल अथवा किसी भी तरह की पवित्रता की अपेक्षा नहीं रखता
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