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आत्म • अध्याय 1 • श्लोक 27
तथैवोपाधिविलये ब्रह्मैव ब्रह्मवित्स्वयम्। क्षीरं क्षीरे यथा क्षिप्तं तैलं तैले जलं जले ॥
उसी प्रकार उपाधियों के विलय होने पर ब्रह्मज्ञानी स्वयं ब्रह्म ही सिद्ध होता है। जिस प्रकार दूध में डाला गया दूध, तेल में डाला गया तेल, और जल में डाला गया जल एकरूप हो जाते हैं, उसी प्रकार ब्रह्मवेत्ता अपने वास्तविक स्वरूप ब्रह्म में अभिन्न रूप से स्थित हो जाता है।
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