जिस वस्तु के सम्बन्ध में प्रमाण की यथार्थता होने पर पदार्थ का ज्ञान उत्पन्न होता है, उसी प्रकार यह आत्मानित्यसिद्ध(सदैव विद्यमान) है; उचित प्रमाण(ज्ञान के साधन) उपलब्ध होने पर वह स्वयं प्रकाशित हो जाता है।
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