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आत्म • अध्याय 1 • श्लोक 31
यथा रजौ निष्क्रियायां सर्पाभासविनिर्गमौ। आवृतेः सदसत्त्वाभ्यां वक्तव्ये बन्धमोक्षणे ॥
जिस प्रकार निष्क्रिय रज्जु (रस्सी) में सर्प का प्रादुर्भाव और लय केवल भ्रम के कारण प्रतीत होते हैं, उसी प्रकार बन्धन और मोक्ष की चर्चा भी आवरण (अज्ञान) की उपस्थिति और अनुपस्थिति के आधार पर ही कही जाती है।
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