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आत्म • अध्याय 1 • श्लोक 22
इतस्ततश्चाल्यमानो यत्किंचित्प्राणवायुना। स्त्रोतसा नीयते दारु यथानिमोन्नतस्थलम्॥
यह शरीर प्राण वायु के द्वारा ही दुर्घटना-उद्र द्वारा संचालित होता है, जैसे जलप्रपात-नदी आदि के स्त्रोतों द्वारा लकड़ियों को ऊपर-नीचे ले जाया जाता है
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