जो तत्त्वनिष्कल(अवयवरहित), निष्क्रिय, शान्त, निर्दोष(निरवद्य), निर्मल(निरञ्जन), अद्वितीय और परम है, तथा आकाश के समान सर्वव्यापक है, उसमें कल्पना(बन्धन-मोक्ष आदि की कल्पना) का स्थान ही कहाँ है?
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