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आत्म • अध्याय 1 • श्लोक 34
निष्कले निष्क्रिये शान्ते निरवद्ये निरञ्जने। अद्वितीये परे तत्त्वे व्योमवत्कल्पना कुतः ॥
जो तत्त्व निष्कल (अवयवरहित), निष्क्रिय, शान्त, निर्दोष (निरवद्य), निर्मल (निरञ्जन), अद्वितीय और परम है, तथा आकाश के समान सर्वव्यापक है, उसमें कल्पना (बन्धन-मोक्ष आदि की कल्पना) का स्थान ही कहाँ है?
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