मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
आत्म • अध्याय 1 • श्लोक 19
प्रियाप्रिये न स्पृशतस्तथैव च शुभाशुभे। तमसा ग्रस्तवद्भानादग्रस्तोऽपि रविर्जनैः॥
जिस प्रकार लोगों को ग्रहण के समय सूर्य अन्धकार से आच्छादित प्रतीत होता है, जबकि वास्तव में वह अग्रस्त (अस्पृष्ट) ही रहता है, उसी प्रकार ब्रह्मज्ञानी को भी प्रिय और अप्रिय, तथा शुभ और अशुभ स्पर्श नहीं करते। वह उनसे सर्वथा असंग और अप्रभावित रहता है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
आत्म के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

आत्म के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें