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आत्म • अध्याय 1 • श्लोक 28
संयुक्तमेकतां याति तथाऽऽत्मन्यात्मविन्मुनिः। एवं विदेहकैवल्यं सन्मात्रत्वमखण्डितम्॥
ठीक उसी तरह आत्मज्ञानी मुनि एवं आत्मा की स्थिति भी एक ही है। इस प्रकार विदेह रूप कैवल्य-पद की प्राप्ति के पश्चात् सन्मात्र अखण्डित विग्रहवान् ब्रह्मभाव की प्राप्ति करके पुनः संसारावर्तन (आवागमन)से मुक्त हो जाता है
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