मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
आत्म • अध्याय 1 • श्लोक 28
संयुक्तमेकतां याति तथाऽऽत्मन्यात्मविन्मुनिः। एवं विदेहकैवल्यं सन्मात्रत्वमखण्डितम्॥
जिस प्रकार दूध दूध में, तेल तेल में, और जल जल में मिलकर एकरूप हो जाते हैं, उसी प्रकार आत्मज्ञानी मुनि भी अपने आत्मस्वरूप में अभिन्न भाव से स्थित हो जाता है। इस प्रकार वह विदेहकैवल्य (उपाधियों से परे परम एकत्व की अवस्था) को प्राप्त होकर अखण्ड सत्स्वरूप (शुद्ध अस्तित्वमात्र) में प्रतिष्ठित हो जाता है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
आत्म के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

आत्म के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें