संयुक्तमेकतां याति तथाऽऽत्मन्यात्मविन्मुनिः। एवं विदेहकैवल्यं सन्मात्रत्वमखण्डितम्॥
जिस प्रकार दूध दूध में, तेल तेल में, और जल जल में मिलकर एकरूप हो जाते हैं, उसी प्रकार आत्मज्ञानी मुनि भी अपने आत्मस्वरूप में अभिन्न भाव से स्थित हो जाता है।
इस प्रकार वह विदेहकैवल्य(उपाधियों से परे परम एकत्व की अवस्था) को प्राप्त होकर अखण्ड सत्स्वरूप(शुद्ध अस्तित्वमात्र) में प्रतिष्ठित हो जाता है।
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