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आत्म • अध्याय 1 • श्लोक 17
नित्यतृप्तोऽप्यभुञ्जानोऽप्यसमः समदर्शनः । कुर्वन्नपि न कुर्वाणश्चाभोक्ता फलभोग्यपि ॥
वह नित्य तृप्त रहता है, यद्यपि बाह्य दृष्टि से भोगों का उपभोग न करता हुआ प्रतीत होता है। वह अतुलनीय होते हुए भी समदर्शी रहता है। वह कर्म करता हुआ भी वास्तव में कर्ता नहीं होता, और कर्मफलों का अनुभव करता हुआ भी वास्तव में भोक्ता नहीं होता
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