अथ परमात्मा नाम यथाक्षर उपासनीयः । स च प्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधियो गानुमानाध्यात्मचिन्तकं वटकणिका वट श्यामाकतण्डुलो वा वालाग्रशतसहस्त्रविकल्पनाभिः | स लभ्यते नोपलभ्यते न जायते न म्रियते न शुष्यति क्लिद्यते न दह्यति न कम्पते न भिद्यते न । च्छिद्यते निर्गुणः साक्षीभूतः । शुद्धो निरवयवात्मा केवल: सूक्ष्मो निष्कलो निरञ्जनो निर्विकारः शब्दस्पर्शरूपरसगन्धवर्जितो निर्विकल्पो निराकाङ् क्षः सर्वव्यापी सोऽचिन्त्यो निर्वर्ण्यश्च पुनात्यशुद्धान्यपूतानि । निष्क्रियस्तस्य संसारो नास्ति ॥
अब परमात्मा का स्वरूप यह है—वह अक्षर(अविनाशी) और उपासना के योग्य है। वह प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि, योग, अनुमान तथा अध्यात्म-चिन्तन के द्वारा जाना जाता है।
वह वटवृक्ष के बीज की सूक्ष्म कणिका, श्यामाक के तण्डुल(अत्यन्त सूक्ष्म धान्यकण) अथवा बाल के अग्रभाग के शत-सहस्रवें भाग से भी अधिक सूक्ष्म है। फिर भी वह इन्द्रियों द्वारा उपलब्ध नहीं होता।
वह न जन्म लेता है, न मरता है; न सूखता है, न गीला होता है; न जलता है, न कम्पित होता है; न टूटता है और न काटा जा सकता है।
वह निर्गुण, साक्षीस्वरूप, शुद्ध, निरवयव, केवल, अत्यन्त सूक्ष्म, निष्कल, निरञ्जन और निर्विकार है। वह शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध से रहित है; निर्विकल्प, निराकाङ्क्ष, सर्वव्यापी, अचिन्त्य और अवर्णनीय है।
वह अशुद्ध और अपवित्र को भी पवित्र करने वाला है। वह निष्क्रिय है; अतः उसके लिए संसार का कोई बन्धन नहीं है।
(संसार का अर्थ— संसरति इति संसारः— गतिशील या परिवर्तनशील होता है। परमात्मा एक रूप रहने वाला होने से उसका कोई समरण नहीं होता; इस भाव से उसे संसार रहित कहा गया है। अगले मन्त्रों में उस आत्म तत्व का स्वरूप दृष्टि होने पर सब जगह उस परमात्मतत्त्व-ब्रह्म के ही भासित होने की बात कही गई है।)
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