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अध्याय 6 — षष्ठ अध्याय

शिवभारतम्
97 श्लोक • केवल अनुवाद
कवींद्र बोलें - शहाजीराजे की पत्नी जीजाबाई के गर्भ से उत्पन्न होने के इच्छुक योगेश्वर विष्णु ने प्रसन्न होकर अपने दर्शन दिए।
एक बार उस सुंदर रानी ने स्वप्न में देवगणों के द्वारा पूजित एवं बाल लीलाओं को धारण करने वाले विष्णु बेटे को अपनी गोद में बैठा हुआ देखा।
उसका रंग सांवला था, उसके हाथों में शंख, चक्र, गदा और कमल था, छाती पर श्रीवल्ला नाम का चिह्न था, गले में कौस्तुभमणि धारण किया था, छाती पर वैजयंती माला लटक रही थी, उसने पीले कपड़े पहन रखे थे,
सिर पर रत्नों से जड़ित मुकुट था, कानों में मकर की कुंडलें चमक रही थी, गालों पर मंद मुस्कान भी, मुख मण्डल पर प्रसन्नता थी,
आंखे कमल जैसी आरक्त एवं बड़ी थी, सुंदर नाक और यह शुभ लक्षणों से संपन्न था, उसका प्रत्येक अवयव सुंदरता का लीलास्थान था, गले में वनमाला से सुशोभित लक्ष्मी उसके समीपस्थ थी,
वह सभी आभूषणों से विभूषिता थी, उसके पद कमलों पर वन, रेखा, ध्वज, और छत्र के चिह्न थे।
उसके बाद शीघ्र ही उस शहाजीराजे की पत्नी ने सामर्थ्यवान विष्णु के अंश को गर्भ में धारण किया।
जिस प्रकार शारदीय मेघ मंडल सूर्य के योग से सुशोभित होता है उसी प्रकार अपने गर्भस्थ उस महान तेज़ के कारण वह सुशोभित होने लगी।
वह तेजोमय गर्भ को धारण करने वाली उस यादवेन्द्र की पुत्री ने उस समय उस भू-तल को विभूषित किया।
बाद में उसको उल्टियां होने लगी, गर्भ के भार के कारण उसकी गति मंद हुई, तब उसके मोटे कटि प्रदेश पर आभूषण भी भारी लगने लगे।
तब अनुपम गौरवर्ण को धारण करने वाले उसके मुंह ने शुभ्रता में शारदीय चंद्रमा का भी उपहास किया।
प्रत्यक्ष जगत प्रभु विष्णु देव ने जिसके गर्भ में प्रवेश किया ऐसी उस सुंदरी के शरीर में भारीपन आने में क्या आश्चर्य है?
उसके पास रहकर उसकी सेवा करने वाली सखियों को वह पाण्डुमुखी गर्भवती रानी अलग ही प्रतीत हो रही थी।
हाथी पर, बाघों पर और किलों पर आरोहण कीजिए, सफेद छत्रों के नीचे स्थित स्वर्ण के सिंहासन पर स्थिरता से अधिष्ठित हो जाइए,
ऊंचे झंड़े को खड़ा कीजिए, सुंदर चामर से हवा करवाईए, दुंदुभी के ध्वनियों को सुनिए, धनुष- बाण, भाले, तलवार, और
कवच को धारण करके युद्ध कर्म को कीजिए, किलों पर अधिकार कीजिए, विजयश्री प्राप्त कीजिए,
बड़े बड़े दान दीजिए, धर्म की स्थापना में बुद्धि लगाइए ऐसी अनेक प्रकार की इच्छाएं उसको प्रतिदिन होने लगी।
फिर वह दिव्य तेजोमय एवं दिव्य रूपवती रानी प्रसूतिगृह में सुशोभित होने लगी। वहां पर प्रसूति कार्य में कुशल एवं कुल तथा व्यवहार से समृद्ध वृद्ध स्त्रियां रात-दिन उसकी सेवा में तत्पर थी।
प्रतिदिन स्वेच्छा से व्यवहार करने वाली एवं अतिशय ध्यान रखने वाली प्रसिद्ध सखियों द्वारा वह सेवित थी।
गर्भवती के उपचार करने में अनुभवी, चिकित्सीय हस्तकला में निपुण और ईमानदार वैद्य बिना थके उसके देहली पर बैठे हुए थे।
सफेदी करने से चमकती हुई उस दीवार पर स्वस्तिक चिन्ह निकाला गया था, सफेद छत के किनारे मोतियों की जालियां लटक रही थी।
ताजे नये पत्तों से उसको सुशोभित किया गया था, सफेद सरसों को वहां सर्वत्र बिखेरा गया था, वहां पर ताजे पानी से भरे हुए घड़े रखें गये थे।
दरवाजों के दोनों ओर उचित देवताओं की आकृतियां निकाली गई थी, चारों ओर अनेक चमकते हुए मंगल दीप रखें गये थे।
ऐसी सभी योग्य वस्तुओं का संग्रह वहां पर किया गया था।
शालिवाहन शके १५५१ शुल्क नामक संवत्सर, उत्तरायण,
शिशिर ऋतु में चलायमान फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि तथा रात्रि के शुभ मुहूर्त पर, अखिल विश्व के साम्राज्य वैभव को प्रकट करने वाले
पांच ग्रहों की अनुकूल स्थिति में एवं तुंग संश्रय होने पर उसने अलौकिक पुत्र रत्न को जन्म दिया।
उसकी अपार सुंदरता, सुवर्ण जैसा रंग, शरीर निरोगी, गर्दन अत्यंत सुंदर एवं उन्नत कन्धे थे,
उसके माथे पर सुंदर पढ़े हुए पुंपराले बाल मनोहर लग रहे थे, उसकी कमल जैसी सुंदर आंखें, नाक नये पलाश के फूलों की तरह,
मुख स्वभावतः हसमुख, आवाज बावल की तरह गंभीर, छाती विशाल एवं मोटी भुजाएं थी।
तब देवों एवं मनुष्यों की प्रसन्नता के कारण से उनके हजारों नगाड़ो की आवाज एक साथ बजने लगीं,
प्रत्येक घर में भिन्न भिन्न प्रकार के वाद्ययंत्र बजने लगे, सभी दिशाएं एवं नदियां स्वच्छ हो गई,
सुगंधित एवं शीतल वायु बहने लगी और आग प्रसन्न होकर आहुत हवि को स्वीकार करने लगी।
श्रुति (वेद), स्मृति, धृति (धैर्य), कांति, शांति, क्षमा, दया, नीति, प्रेम, कार्य, सिद्धि, लक्ष्मी, सरस्वती,
संतुष्टि, पुष्टि, शक्ति, लज्जा, विद्या, और सद्वंदन, ये सभी देवता उस देव के चारों ओर इकट्ठे हो गए।
घमण्डी दर्याखान पठान के साथ युद्ध करने के लिए शहाजीराजे के दूसरे प्रांत में चले जाने पर,
देवों पर कृपा एवं राक्षसों का निग्रह करने के लिए उस जगत प्रभु ने भोंसले कुल में अवतार लिया।
तब अजन्मा होते हुए भी जन्म लिए हुए उस प्रभु का तुरंत विधिज्ञ पुरोहितों ने यथाविधि जातकर्म संस्कार किया।
जो स्वयं में संपूर्ण संसार के रक्षण के लिए समर्थ होने पर भी सूक्तज्ञों ने उसका सूक्तों के द्वारा स्वस्तिवाचन किया।
तब मनुष्य रूप में अवतरित हुए विष्णु के अतिशय तेज से रात्रि भी दिन की तरह प्रकाशमान हो गई।
आदित्य, वसु, विश्व, रुद्र, मरुद्रण, यक्ष, साध्या, गंधर्व, विद्याधर,
नंदिनी प्रमुख गाएं, ऐरावतादि हाथी, नारदादि देवर्षि और सभी अप्सराएं,
इंद्र, अग्नि, धर्मराज, नैर्ऋत, वरूण, वायु, अश्व, कुबेर, शंकर,
ये आठ दिक्पाल, अश्विनीकुमार, सूर्य चन्द्र देव, तेजोमय ग्रह और नक्षत्र,
घटी, मुहूर्त, अहोरात्र, पक्ष, मास, ऋतु, वर्ष, मनुष्य युग, देवयुग, और मन्वंतर
इन सभी ने पृथ्वी का भार कम करने के लिए अवतीर्ण हुए उस जगतपति के समीप आकर उसका स्वस्तिवाचन किया।
गणेश, जन्मदात्री षष्ठी देवी, जीवन्तिका, स्कन्द (कार्तिकस्वामी), नारायण, बांसुरी, बलराम, हल,
धनुष, वाण, तलवार और अनेक प्रकार के शस्त्रास्त्र इन सब की उन पुरोहितों ने पवित्र होकर
पांचवें, आठवें और नौवें दिन उचित मंत्रों से प्रसूतिगृह में पूजा की। इस बालक की रक्षा कीजिए ऐसा कहकर नमस्कार किया और
क्षेत्रपाल, भूत, राक्षस, योगिनी, दिक्पाल, इनकी घर से बाहर अनेक बार बलि दी गई।
तिनों लोकों में जागरूक उसके षष्ठी के जागृत हो जाने पर, लोगों में उस महात्मा का जन्म महत्त्वपूर्ण होने के कारण उसके दसवें दिन
ताम्रपर्णी, कावेरी, तुंगभद्रा, मलप्रभा, कृष्णा, कोयना, वेणा, नीरा, भीमा,
गोदावरी, गायत्री, प्रवरा, वंजुला, पूर्णा, पयोष्णी, तापी, नर्मदा, महानदी,
क्षिप्रा, चंबल, मद्रा, यमुना, वेत्रवती, भागीरथी, चंद्रभागा, गोमती, गंडकी,
इरावती, (रावी) विपाशा, शतद्रु (शतलज) सरस्वती, वितस्ता (झेलम), सरयू, तमसा, वधूसरा,
ये अत्यधिक पवित्र नदियां, सिंधु, घर्घर, शोण इत्यादि मोक्षदायक नद, पुष्करादि सरोवर एवं समुद्र आदि के साथ
अदृश्य रूप से ये सभी पुण्यदाई नदियां बड़े आनंद के साथ उसके अभिषेक के लिए एकत्रित हो गई।
वहां पर देवसेना, शची, स्वाहा, समृद्धि, पार्वती, अदिति, विनता, संज्ञा, सावित्री, अरूंधति
इन कुलस्त्रियों ने मिलकर उस अप्रतिम लावण्यमय बालक के साथ उस गर्भवती को भी स्नान कराया।
शरीर पर पीले वस्त्र धारण की हुई, अलंकार धारण की हुई, गोद में बालक को ली हुई और
नवोदित सूर्य के दिनश्री के समान सुंदर शोभायमान उस बालक की मां की सुवासिनियों ने आरती की।
शिवनेरी किले पर इस पुरुषोत्तम (शिवाजी) का जन्म होने के कारण उसका "शिव" यह नाम लोक में प्रसिद्ध हो गया।
यह बलवान बालक इस लोक में अलौकिक कर्म करेगा, म्लेच्छों का नाश करके अपनी अतुल कीर्ति को फैलायेगा,
दक्षिण, पश्चिम, पूर्व और उत्तर इन दिशाओं को अपने बाहुबल से जीतकर यह विजयी पुत्र स्वराज्य की स्थापना करेगा,
यह साहसी बालक समुद्र को भी अपने अधीन करेगा और अपने सेना की सहायता से सभी दिशाओं से कर वसूल करेगा,
यह प्रतापी बालक गिरिदुर्ग, जलदुर्ग, वनदुर्ग और स्थलदुर्ग का रक्षण करेगा और
वह अपने पराक्रम से दिल्लीपति मस्तक पर पैर रखकर संपूर्ण संसार पर आधिपत्य स्थापित करेगा।
दुर्गम मार्ग, गहन पहाड़ी, नदी और समुद्र के बीच जिसकी गति अव्यवहित है
ऐसा यह शूर राजा, पाण्ड्य, द्रविड़, लाट, कर्णाट, केरल, कराड, वैराट, आंध्र, मालवा, आभीर, गुजरात और
दुष्ट यवनों द्वारा अनेक बार अधिग्रहीत आर्यावर्त, कुरूजांगल, सौवीर (मुल्तान), धन्व (मारवाड़), सौराष्ट्र (काठेवाड) कोसल (अयोध्या)
बाल्हीक, मद्र, गान्धार, त्रिगर्त, द्वारका, सिंध, कलिंग, कामरूप (असम) अंग (बिहार) बंगाल, कांबोज, केकय,
पारसी, शिबि, शाल्व, पुलिंद, बर्बर, कश्मीर, मत्स्य, मगध, विदेह, उत्कल, टंकण,
किरात, काशी, पांचाल, चेदि, कुन्तल, खश, शूरसेन, हूण, हैमवत,
उंद्र, पुंड्र, ललित्थ, वे सभी देश अपने उज्ज्वल पराक्रम से जीतकर यह चिरंजीवी महाराजा होगा।
पृथु, पुरूरवा, अंबरीष, उशीनर का पुत्र शिबि,
मांधाता, नल, भरत, भगीरथ,
हरिश्चंद्र, दशरथ का पुत्र राम, जनक, ययाति, नहुष,
धर्मराज युधिष्ठिर इन पहले हुए राजाओं की तरह शहाजीराजे का पुत्र शिवाजी भी वैसा ही होगा,
यह भविष्यवाणी सभी सिद्धांतों में पारंगत ज्योतिषियों ने उस बालक की जातक सभा में बतायी।
उसके शरीर के अवयवों के अत्यधिक व्यक्त होने से उसमें सुंदरता आई, स्थिर लावण्य के संयोग से वह विलक्षण मनोहारी लगने लगा,
अनेक प्रकार के रत्नों एवं मोतियों से जड़ित सोने की मंजुलाएं सोने के मुकुट पर चमक रही थी,
चमकदार मोतियों की मणि माला के अंतिम भाग में लटकने वाले सुवर्णमय पीपल के पत्ते खेलते समय उसके मस्तक पर हिल रहे थे,
अमूल्य हीरे एवं विचित्र पद्मराग के किरणों की विलक्षण चमक से युक्त आभूषण बाहु में धारण किए हुए थे,
भारी रत्नों से जड़ित नुकीले बाघ के नखों की आकृति को जिसमें पिरोया गया है ऐसी काली काचमणि की माला गले में पहनने से वह शोभित हो रहा था,
उत्तम रत्नों के समूह से उत्कर्ष को प्राप्त हुई जीवंतिका देवी की सुवर्ण प्रतिमा उसके छाती पर पड़ी हुई थी,
प्रवाल एवं नील रंग से सम्मिश्रित सुवर्णमणि से निर्मित सुंदर कंकण हाथों में धारण किए हुए थे,
अहो! वह आनंद की प्रतिमूर्ति था, उसके कमर में दिव्य मेखला थी, पैरों में मणि जड़ित चमकदार नूपुर थे,
विदग्ध स्त्रियों ने आंखों में चमकदार काजल डालीं हुई थी, अत्यंत सुंदर सोने का कुर्ता पहना हुआ था।
इस प्रकार हंसमुख बालक को धाइयां अत्यधिक प्रेम से संभाल रही थी।
राजपत्नी का वह बालक, अंदर और बाहर सर्वत्र विचरण कर्ता एवं सर्वव्यापी होने के बाद भी उसको बाहर ले जाकर सूर्य के दर्शन करवाये।
उस राजकुमार के उपवेशन एवं अन्नप्राशन ये संस्कार यथाविधि और क्रमपूर्वक किए गए।
उसके बाद दर्याखान को अपने बाणों से विदीर्ण करके और उसके घमण्ड का हरण करके विजयी शहाजीराजे भी शिवनेरी आ गये।
संभाजी का छोटा भाई जो कमलनेत्र शिवाजी ने सदा पराक्रमी शहाजीराजा के मुख का आनंद से अवलोकन किया।
उस समय उस राजा ने आनंदित होकर शीघ्रता से इतना दान किया-
की सभी याचकों को दूसरों के मदद की बहुत दिनों तक आवश्यकता ही नहीं पड़ी।
अपनी किरणें कमल पर बिखेर कर उसको विकसित करते हुए सूर्य पृथ्वी पर अत्यधिक विचरण करता है,
उसी तरह यह बाल सूर्य राजपुत्र अखिल अंधकार को नष्ट करते हुए धरि-धरि वृद्धि को प्राप्त होने लगा तो वह अतिशय सुंदर दिखने लगा।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
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