गाः काञ्चनानिकरिणस्तुरगांश्च राजा।
रत्नानि च प्रमुदितो व्यतरत्तदानीम् ।।
उस समय उस राजा ने आनंदित होकर शीघ्रता से इतना दान किया-
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