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अध्याय 31 — एकत्रिंशत्तम अध्याय
शिवभारतम्
40 श्लोक • केवल अनुवाद
कवीन्द्र बोले - पुनः राजपुर से शीघ्र परावर्तित हुए शिवाजी राजा को मालसुरे सेना का सामना करना पड़ा।
जिसने बड़े पराक्रम से शत्रु की सेना को पराजित किया वह तानाजी आ गया, यह नीलकण्ठ राजा के पुत्र ने समीप जाकर बताया तो वंदन करने वाले उस अभिमानधनी तानाजी को देखकर राजा ने उसका सेना के साथ बड़े आदर से सत्कार किया।
तत्पश्चात् सूर्यराज द्वारा किये उस अविनीत व्यवहार को सुनकर पराक्रमी शिवाजी राजा के अत्यन्त क्रुद्ध होने पर भी उसने अपने क्रोध को रोक लिया।
शिवाजी द्वारा शीघ्र भेजे गए दूत ने प्रभावली के राजा के पास आकर सारगर्भित वचन बोलें।
दूत बोला - आदिलशाह की सहायता करके तूने शिवाजी राजा के साथ बहुत अपराध किए और संगमेश्वर में स्थित शिवाजी की सेना पर रात में तूने सेना के साथ बड़ी निर्भयता से आक्रमण किए वह तेरे महान् अपराध है, ये प्रभावली के राजा विश्वविजेता शिवाजी द्वारा कैसे सहन किये जाए।
अतः वह अतिशय क्रुद्ध होते हुए भी सौभाग्य से तेरे पर दया करके उसने आज तुझे जो आज्ञा दी है, वह बताता हूं।
शिवाजी बोला - हे महाबाहो! वन के हाथी के समान उन्मत्त जो बलवान राजा मेरे से भयभीत होकर तेरे पास आया है उस दुष्ट बुद्धि वाले अपराधी पाली राजा के प्रांत को मैं अधिकृत करने के लिए सजग हो गया हूं।
तो तू हमसे भयभीत मत हो और पाली में तुझे अवश्य आना है क्योंकि तुझे मैं वही अभयदान दूंगा।
यदि अभिमान के कारण तू वहां नहीं आया तो उसकी अवस्था तुझे प्राप्त होगी। मेरे क्रोध से तेरी रक्षा करने वाला आज कोई भी नहीं है।
तब इस प्रकार दूत से शिवाजी के वचनों को सुनकर 'तू जा मैं आता हूं' इस प्रकार सिंगारपुर का राजा उससे बोला।
फिर पाली जाकर उसने शिवाजी राजा को सूर्य राजा के वचनों को एकांत में बताया।
तत्पश्चात शिवाजी ने पाली नामक उस प्रांत को अधीन करके दया करने योग्यों पर दया एवं निग्रह करने योग्यों पर निग्रह किया।
ब्राह्मण, क्षत्रिय वैश्य, शूद्र, अंसारी, सोनार, लोहार, ठेठरे, बढई, मिस्त्री, नाई, प्रतिहारी, माली, कुम्हार, शिल्पी भाट, तांति, दरजी, पुताईवाला, तांबोली, तेली, धोबी, महा विक्रेता, घनगर, गोपालक, देवल, किसान बंधुओं का हलवाई, कोमाती ढोल, बांसुरी वादक, मृदंग वाद्य विद्या में निपुण, शिकारी, शस्त्रों को पैदा करने वाला, ऋण से वृद्धि प्राप्त होने वाले, बांध बनाने वाले, सपेरे, चमार, भील, कोली चांडाल इस प्रकार के भयभीत लोग फिर तुरंत उसी प्रांत में आकर प्रतिदिन वृद्धि प्राप्त होकर अनेक प्रकार से आनंदित हुए।
तब उस देश की रक्षा के लिए अत्यंत समर्थ चित्रदुर्ग इस नाम से विख्यात निपुण गढ़ को देखकर उस उत्साही शिवाजी ने उसके मस्तक पर निपुण कारीगरों के द्वारा चारों और ऊंचा तट बनवाया।
और यह इस प्रांत का आभूषण ही है ऐसा सूचित करने के लिए इस गढ़ को मंडनगढ़ नाम दिया।
उस घर के स्वामी ने उस अत्यंत दुर्गम किले के रक्षा कार्य में निपुण दुर्जय अध्यक्ष को नियुक्त करके एवं सर्वगुण संपन्न कुछ सेना को रखकर वह निश्चिंत दक्ष राजा शृंगार के राजा को जीतने के लिए निकल गया।
पंडित बोले - प्रभावली के राजा को एक क्षण में पराजित करने में समर्थ शिवाजी पहले ही श्रृंगारपुर क्यों नहीं गया? और शत्रुता धारण करने वाले उस अभिमानी राजा को अभय दान देता हूं ऐसा बोल कर उसके पास दूत क्यों भेजा?
कविंद्र बोला - जयवल्ली के विजय के पराक्रम से विख्यात हुए इंद्र की तरह पराक्रमी शिवाजी को पहले मान्य करके सूर्यराज ने प्रभावली का समृद्ध राज्य स्वयं पालन करने की इच्छा से तेरा मैं कृतपुत्र हूं ऐसा संदेश भेजकर निवेदन किया था।
तब से लेकर उस शरण इच्छुक राजा का रक्षण शरणागत की रक्षा करने वाले शिवाजी ने बहुत समय तक किया।
जब जब शिवाजी राजा ने शत्रुओं से युद्ध किया तब तब सूर्यराज ने उसकी सहायता की।
तत्पश्चात दुर्भाग्य से नष्ट बुद्धि वाले भयभीत, घने अरण्य में रहने वाले अभिमानी, कपटी सूर्यराज ने शिवाजी के शत्रु अरविंद की गुप्त तथा स्पष्ट रूप से अनेक प्रकार की सहायता की।
उसके बारंबार अपराध करने पर भी एवं वह निग्रह करने में समर्थ होने पर भी दृढ़ व्रती शिवाजी ने उसके निग्रह करने का विचार मन में कैसे नहीं लाया?
समीप बुलाने पर भी जब वह अभिमान से समीप नहीं आया तब शिवाजी सूर्यराज भोंसले पर क्रोधित हुए।
तत्पश्चात वह राजा वेगवान पदार्थों को साथ लेकर आक्रमण करने के लिए निकल गया।
वह महाबली शिवाजी पालकी में बैठकर शीघ्र जा रहा था तो उसने सामने सरवरनगर को देखा।
तब क्रोधित शिवाजी समीप आ गया है ऐसा सुनकर प्रभावली का राजा दुखी होकर अपने लोगों से बोला।
सूर्यराज बोला देवो एवं राक्षसों द्वारा पूजित कपट युद्ध करने वाला कर्तव्य युक्त एवं बलवान शिवाजी अनेक सैनिकों को साथ लेकर हमारे से सिंगारपुर को ग्रहण करने के लिए उद्युत होकर वह गुप्त रूप से समीप आ गया है।
उस समर्थ से होने वाले युद्ध से अपार समुद्र की तरह कैसे पार पाओगे?
ऐसा बोलकर एवं अपने लोगों का अनुमोदन प्राप्त करके उसने अपनी रक्षा करने की इच्छा से पलायन करने का विचार किया।
पंडित बोले - अत्यंत दुर्गम वन में निवास करता है जिसकी प्रायः प्रतिदिन युद्ध करने की इच्छा थी, जिस अजेय राजा की सत्ता को सह्याद्री मान्य करता था जिसने अन्यों के लिए दुर्लभ ऐसे पूर्व राजाओं के सिंहासन को प्राप्त किया, अपने राष्ट्र की रक्षा के इच्छुक जिस अभिमानी आदिलशाह ने जिसके साथ संधि करके अपनी दुरावस्था को बचा लिया, जिसने हबशों के अधीन लोगों को अपने अधीन लाया, जिसने समुद्र को भी आज्ञाकारी बनाया, जिससे परंपरागत सेना अत्यधिक आनंदित हो गई जिसको किसी ने अपने श्रेष्ठ पराक्रम से पराजित नहीं किया ऐसे उस प्रभावली के राजा ने भी अपना अपकार करने के इच्छुक शिवाजी से क्यों युद्ध नहीं किया?
कविंद्र बोले पहले प्रलयाग्नि के समान प्रतापी शिवाजी संगमेश्वर से पाली की ओर चला गया है ऐसा सुनकर उस मूर्ख सूर्य राजा ने अपना कोई शत्रु बचा नहीं है ऐसा समझकर एवं युद्ध का प्रसंग नहीं है देखकर सिंह की तरह पराक्रमी जगत वंदनीय, इकट्ठे हुए विभिन्न सेना नायकों को अपने-अपने घर जाने की अनुमति दे दी।
फिर पाली से शीघ्र शिवाजी लौट आया तब सूर्य राजा अपनी सेना को इकट्ठा करने में असमर्थ रहा।
इस कारण से वास्तव में दुखी होकर ही अरे पंडितों! उस प्रभावली के राजा ने युद्ध करने की इच्छा व्यक्त नहीं की।
विष्णु के अवतार, अनेक सैनिकों के अधिपति, घमंडी, आदिलशाह के बाहुबल के सुदृढीकरण के अभिमान को हरण करने वाला, दिल्ली पति की सेना का विनाश करने वाला, व्रज के समान शरीर वाला, अत्यंत गुप्त मंत्रणा करने वाला, स्वतंत्र अनुभवी, शत्रु के दुर्जेय किलों को जीतने वाला, जिद्दी चंद्रराव मोरे के भुजाओं की चिंता करने वाला, अफजलखान के शत्रु शिवाजी से बड़ी शत्रुता करके सूर्य दादा ने पलायन करने का विचार किया इसमें मुझे कुछ आश्चर्यजनक प्रतीत नहीं होता है।
जो सैकड़ों उन्नत एवं विस्तृत घोड़ियों के समूह से युक्त था, वृक्षों के कोटरों के गर्भ में बैठे हुए उल्लू दुत्कार कर रहे थे, जो बड़े-बड़े नागो द्वारा परित्यक्त अनेक केंचुलियो से चमक रही थी, जहां के वृक्षों की शाखाओं ने आकाश व्याप्त कर दिया था, जो तट पर नाचने वाले अनेक मोरों से मनोहर दिख रही थी, जिसके घोसलों से तोते उड़ रहे थे, जहां कुछ (पक्षी) आवाज कर रहे थे, जिसने किलो के तटों को घेर लिया, जो मेघ की तरह दिख रही थी, जिसके वृक्षों के पल्लव प्रतिक्षण कुंदन करने वाले बंदरों से हिल रहे थे, जहां सुअर घर घर की आवाज कर रहे थे, जिसमें लोमड़ी एवं मदमस्त हाथी की तरह नीलगाय थी, जिसकी घनी झाड़ियों में बड़े-बड़े सिंह छिपे थे, जिसमें अनेक निर्भय भालु वल्मीक खोज रहे थे, जो भयंकर होती हुई भी ऊंचे ऊंचे झोपड़ियों से सुशोभित थी, ऐसे उस सिंगारपुर की झाड़ियों में प्रवेश करने वाला विविध प्रकार से आक्रमण करने का इच्छुक वह शिवाजी, सूर्यराज भाग गया ऐसा सुनकर सेना सहित खिन्न हो गया।
शरणागतों को अभय देने वाले, अभिमानियों के अभिमान को नष्ट करने वाले, महान बाहुबल के अभिमान को धारण करने वाले उस शिवाजी ने सिंगारपुर के समीप आकर उसको देखा।
अपने सैनिकों द्वारा तत्काल व्याप्त शृंगारपुर में पालकी में बैठकर शीघ्रता से प्रवेश करके देखते समय 'मैं भी शत्रुओं के लिए अजेय हूँ' ऐसा वह मानने लगा।
शत्रुओं के लिए जो अजेय है ऐसा जिसका यश विख्यात है, उस शत्रु राजा के सिंहासन को उसने अपने पैरों से लात मार दी, उस समय वह लोगों को महाभिमानी प्रतीत हो रहा था।
उसके पास से सुदृढ़ अभयदान लेकर इकट्ठे हुए पौर लोगों ने शृंगार में पुनः प्रवेश करके तथा समर्थ होकर उसको अनेक अलंकृत पद दियें।
तत्पश्चात् कुछ सैनिकों के साथ शीघ्र दिशाओं में पलायन किए हुए शत्रुओं को मारने में 'जिसका प्रताप त्रिभुवन के लोकों जीतने में समर्थ है' ऐसा शिवाजी लज्जित हुआ।
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धर्म का अन्वेषण
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