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शिवभारतम् • अध्याय 31 • श्लोक 13
विप्राश्च बाहुजास्तद्वदूरव्याश्च जघन्यजाः।। कांस्यकाराः कलादाथ व्योकाराः शैल्विकस्तथा। तक्षाणः पलगंडाच नापिताः प्रतिहारिकाः। मालाकाराः कुंभकाराः कारुकाच कुशीलवाः ।। तंतुवायास्तुन्नवाया रंगाजीवाच भूरिशः। तांबूलिकाश्चाक्रिकाश्च रजकाः शौडिका अपि ।। अजापालाश्च गोपाला देवलाश्च कृषीवलाः। गांधिकाश्च तथा कांदविकाः कांबविकाः पुनः ॥ मार्देगिकाश्च वेणुध्माः पाणिवादाश्च वैणिकाः। वाद्यविद्याविदग्धाश्च लुब्ध्काश्चासिधावकाः ।। कुसीदवृत्तयः काण्डकारिणश्चाहितुंडिकाः । पादूकृतः पुलिंदाश्च जालिकाश्च जनंगमाः ॥ उपलब्धभयाः सद्यस्तमेत्य विषयं पुनः । दिने दिने वर्धमानश्रियो नन्दन्ननेकधा ॥
ब्राह्मण, क्षत्रिय वैश्य, शूद्र, अंसारी, सोनार, लोहार, ठेठरे, बढई, मिस्त्री, नाई, प्रतिहारी, माली, कुम्हार, शिल्पी भाट, तांति, दरजी, पुताईवाला, तांबोली, तेली, धोबी, महा विक्रेता, घनगर, गोपालक, देवल, किसान बंधुओं का हलवाई, कोमाती ढोल, बांसुरी वादक, मृदंग वाद्य विद्या में निपुण, शिकारी, शस्त्रों को पैदा करने वाला, ऋण से वृद्धि प्राप्त होने वाले, बांध बनाने वाले, सपेरे, चमार, भील, कोली चांडाल इस प्रकार के भयभीत लोग फिर तुरंत उसी प्रांत में आकर प्रतिदिन वृद्धि प्राप्त होकर अनेक प्रकार से आनंदित हुए।
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