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शिवभारतम् • अध्याय 31 • श्लोक 30
मनीषिण उचुः - आसीदवस्थितिर्यस्य वनदुर्गे सुदुर्गमे। अहन्यहनि च प्रायो मतिरायोधनोद्यमे ।। ४६ सुदुर्धर्षस्य सह्यादिर्मनुते यस्य शासनम्। येनान्यदुर्लभं लब्ध बत पूर्वनृपासनम् ।।४७ कृतागसापि संधाय दौस्थ्यं तत्याज येदिलः ।॥४८ कुर्वता स्ववशानेव हबसानवशानपि। अकारि विनयग्राही येन वै मकरालयः ।। स्वराष्ट्ररक्षणाकांक्षी येन दुर्दतचेतसा । अनंददधिकं येन पारंपर्यागता चमूः। यः परेणानुभावेन परिभूतो न केनचित् ।। सोऽपि प्रभावलीपालः क्षत्रधर्मविदां वरः। नायुध्यत कथं तेन शिवेनापचिकीर्षता ।।
पंडित बोले - अत्यंत दुर्गम वन में निवास करता है जिसकी प्रायः प्रतिदिन युद्ध करने की इच्छा थी, जिस अजेय राजा की सत्ता को सह्याद्री मान्य करता था जिसने अन्यों के लिए दुर्लभ ऐसे पूर्व राजाओं के सिंहासन को प्राप्त किया, अपने राष्ट्र की रक्षा के इच्छुक जिस अभिमानी आदिलशाह ने जिसके साथ संधि करके अपनी दुरावस्था को बचा लिया, जिसने हबशों के अधीन लोगों को अपने अधीन लाया, जिसने समुद्र को भी आज्ञाकारी बनाया, जिससे परंपरागत सेना अत्यधिक आनंदित हो गई जिसको किसी ने अपने श्रेष्ठ पराक्रम से पराजित नहीं किया ऐसे उस प्रभावली के राजा ने भी अपना अपकार करने के इच्छुक शिवाजी से क्यों युद्ध नहीं किया?
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