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शिवभारतम् • अध्याय 31 • श्लोक 18
कवीन्द्र उवाच - जयवल्लीजयाद्येन कर्मणा प्रथितं शिवम्। सूर्यराजः पुरा मत्वा पुरारिसमविक्रमम् ।। प्राज्यं प्रभावलीराज्यं पिपालविषुरात्मना। तव क्रीतसुतोऽस्मीति वाचिकेन व्यजिज्ञपत्।।
कविंद्र बोला - जयवल्ली के विजय के पराक्रम से विख्यात हुए इंद्र की तरह पराक्रमी शिवाजी को पहले मान्य करके सूर्यराज ने प्रभावली का समृद्ध राज्य स्वयं पालन करने की इच्छा से तेरा मैं कृतपुत्र हूं ऐसा संदेश भेजकर निवेदन किया था।
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