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शिवभारतम् • अध्याय 31 • श्लोक 35
अथोन्नतानतशिलाशतसंकुलितांतराम्। तरुकोटरसंविष्टघूकघूत्कारगर्भिताम्।। महोरगविनिर्मुक्तानेकनिर्मोकभास्वराम्। अपराविटपिव्रातविटपव्याप्तपुष्कराम्।। उपकण्ठनटन्नैकनीलकण्ठमनोहराम्। नीडान्तरोत्पतत्कीरां किकीदिविकृतस्वराम् ।। परिश्लिष्टाचलतटामम्भोधरघटाकृतिम्। प्रतिक्षणोच्चलच्छाखामृगांदोलितपल्लवाम्।। स्तब्धरोमसमारब्धघर्घरस्वरघोषणाम्। मृगादनवतीं माद्यदिभसंनिभसैरिभाम् ।। घनकर्मारकुंजांतर्निद्राणव्याघ्रपुंगवाम्। अभीकानेकभल्लूककृतवल्मीकदारणाम्।। विसंकटामपि कुटैरुत्कटैः कृतसंकटाम्। विशन् सुभटश्रृंगारः स श्रृंगारपुराटवीम् ।। विविधास्कन्दनाकांक्षी सूर्यराजमपद्रुतम्। निशम्यानीकसहितो विमनस्क इवाभवत्।।
जो सैकड़ों उन्नत एवं विस्तृत घोड़ियों के समूह से युक्त था, वृक्षों के कोटरों के गर्भ में बैठे हुए उल्लू दुत्कार कर रहे थे, जो बड़े-बड़े नागो द्वारा परित्यक्त अनेक केंचुलियो से चमक रही थी, जहां के वृक्षों की शाखाओं ने आकाश व्याप्त कर दिया था, जो तट पर नाचने वाले अनेक मोरों से मनोहर दिख रही थी, जिसके घोसलों से तोते उड़ रहे थे, जहां कुछ (पक्षी) आवाज कर रहे थे, जिसने किलो के तटों को घेर लिया, जो मेघ की तरह दिख रही थी, जिसके वृक्षों के पल्लव प्रतिक्षण कुंदन करने वाले बंदरों से हिल रहे थे, जहां सुअर घर घर की आवाज कर रहे थे, जिसमें लोमड़ी एवं मदमस्त हाथी की तरह नीलगाय थी, जिसकी घनी झाड़ियों में बड़े-बड़े सिंह छिपे थे, जिसमें अनेक निर्भय भालु वल्मीक खोज रहे थे, जो भयंकर होती हुई भी ऊंचे ऊंचे झोपड़ियों से सुशोभित थी, ऐसे उस सिंगारपुर की झाड़ियों में प्रवेश करने वाला विविध प्रकार से आक्रमण करने का इच्छुक वह शिवाजी, सूर्यराज भाग गया ऐसा सुनकर सेना सहित खिन्न हो गया।
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