जिसने बड़े पराक्रम से शत्रु की सेना को पराजित किया वह तानाजी आ गया, यह नीलकण्ठ राजा के पुत्र ने समीप जाकर बताया तो वंदन करने वाले उस अभिमानधनी तानाजी को देखकर राजा ने उसका सेना के साथ बड़े आदर से सत्कार किया।
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