आगन्तासि न चेद्दर्पात् तहि गन्तासि तद्दशाम्। न विद्यतेऽद्य मत्कोपात् कोऽपि गोपायिता तव ।।
यदि अभिमान के कारण तू वहां नहीं आया तो उसकी अवस्था तुझे प्राप्त होगी। मेरे क्रोध से तेरी रक्षा करने वाला आज कोई भी नहीं है।
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