नृवाह्यं यानमारुह्य व्रजन्नथ स सत्वरः। समपश्यन्महासारः पुरं सारवरं पुरः ।।
वह महाबली शिवाजी पालकी में बैठकर शीघ्र जा रहा था तो उसने सामने सरवरनगर को देखा।
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