मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
शिवभारतम् • अध्याय 31 • श्लोक 34
विष्वक्सेनावतारेण नैकसैनिकवर्तिना। दृप्यद्येदिलदोः स्तंभदायं दम्भापहारिणा।। दीर्णदिल्लीन्द्रसैन्येन वज्रप्रतिममूर्तिना । अतीवाव्यक्तमन्त्रेण स्वतन्त्रेणानुभाविना ।। दुर्गाद्यविद्विषदुर्गग्राहिणा हठवाहिना। चन्द्रराजभुजच्छेदकारिणाफजलारिणा।। विरच्य विपुलं वैरं पलायनपरं मनः। चकार सूर्यराजो यत्तन्न चित्रकरं मम ।।
विष्णु के अवतार, अनेक सैनिकों के अधिपति, घमंडी, आदिलशाह के बाहुबल के सुदृढीकरण के अभिमान को हरण करने वाला, दिल्ली पति की सेना का विनाश करने वाला, व्रज के समान शरीर वाला, अत्यंत गुप्त मंत्रणा करने वाला, स्वतंत्र अनुभवी, शत्रु के दुर्जेय किलों को जीतने वाला, जिद्दी चंद्रराव मोरे के भुजाओं की चिंता करने वाला, अफजलखान के शत्रु शिवाजी से बड़ी शत्रुता करके सूर्य दादा ने पलायन करने का विचार किया इसमें मुझे कुछ आश्चर्यजनक प्रतीत नहीं होता है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
शिवभारतम् के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

शिवभारतम् के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें