मनीषिण उचुः-
क्षणात् प्रभावलीपालं परिभावयितुं प्रभुः । पुरैव न कथं यातः शिवः श्रंगारपत्तनम् ।। कथं च साभिमानाय दधानाय प्रतीपताम्। अभयं ते ददामीति दूतं तस्मै विसृष्टवान् ।।
पंडित बोले - प्रभावली के राजा को एक क्षण में पराजित करने में समर्थ शिवाजी पहले ही श्रृंगारपुर क्यों नहीं गया? और शत्रुता धारण करने वाले उस अभिमानी राजा को अभय दान देता हूं ऐसा बोल कर उसके पास दूत क्यों भेजा?
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