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अध्याय 50 — अथ खड्गलक्षणाध्यायः
बृहत्संहिता
26 श्लोक • केवल अनुवाद
पचास अङ्गुल प्रमाण वाला खड्ग उत्तम, पच्चीस अङ्गुल का अधम और पच्चीस अङ्गुल से पचास अङ्गुल के भीतर का खड्ग मध्यम होता है। अङ्गुलमान को लेकर विषम पर्व पर स्थित व्रण अशुभ है, जैसे-प्रथम, तृतीय, पञ्श्चम आदि विषम अङ्गुल पर आगे कथित लक्षणयुत व्रण हो तो अशुभ होता है।
चल, वर्षमान, छत्र, शिर्वालङ्ग, कुण्डल, कमल, पताका, खड्ग और शुभ वस्तुओं काजल ( चिह) प्रशस्त होता है।
गिरगिट, काक, गिद्ध, मांसभोजी पक्षी, विना शिर के पुरुष और बिच्छू की आकृति का जण शुभ नहीं होता है तथा वंश (खड्ग के उच्च भाग में) अनुगत ( स्थित ) नाना आकृति वाले व्रण भी शुभ नहीं होते हैं।
फटा हुआ, छोटा, दूंटा हुआ, वंशप्रदेश से कटा हुआ, दृष्टि और मन से अप्रिय तथा शब्दरहित खद्दग अशुभकारी और इसे के विपरीत लक्षणयुत खड्ग शुभकारी होता है।
खड्ग से अचानक शब्द हो तो मरण, म्यान से नहीं निकलता हो तो पराजय, म्यान से अपने-आप निकल जाय तो युद्ध और अनायास खड्ग प्रज्ज्वलित हो जाय तो विजय होती है।
राजा अकारण खड्ग को प्यान से न निकाले, न चलाये, उसमें अपना मुख न देखे, उसकी कीमत न बतावे, उसका उत्पत्तिस्थान न बताये, अङ्गलियों से न नापे और असंयत होकर उसको स्पर्श न करे ।
गाय के जीभ के समान आकृति वाला, नीलकमलदल के सदृश, बाँस के पत्रसदृश, करवीर फूल के पत्रसदृश, शूल की तरह अग्र भाग वाला और वर्तुलाकार अग्र भाग बाला खड्ग प्रशस्त होता है।
यदि खड्ग प्रमाण से अधिक हो जाय तो उसको काटना नहीं चाहिये, किन्तु घिसकर प्रमाणतुल्य करना चाहिये। यदि खड्ग को मूल भाग से काटे तो राजा और अग्रभाग से काटे तो उसकी माता को मृत्यु होती है।
जिस तरह खियों के मुख पर तिल देखकर गुह्य स्थानीय तिल बताया जाता है, उसी तरह खड्ग की मूठ में दाग देखकर उसके उसके मध्य मध्य में में व्रण (छेद) कहना चाहिये।
यदि कोई खड्गधारी पुरुष आकर प्रश्न करे कि 'इस खड्ग में व्रण है या नहीं' तो उस समय वह प्रश्नकर्ता जिस अङ्ग का स्पर्श करता हो, उसको निश्चय करके वक्ष्यमाण शाख को जान कर कोशस्थित खड्ग में व्रण कहना चाहिये ।
यदि प्रश्नकर्ता शिर को स्पर्श करे तो खड्ग मूल से प्रथम अङ्गल में, ललाट का स्पर्श करे तो द्वितीय अङ्गुल में, घूमध्य का स्पर्श करे तो तृतीय अङ्गुल में और नेत्र का स्पर्श करे तो चतुर्थ अङ्गुल में व्रण कहना चाहिये।
नासिका का स्पर्श करे तो पञ्चम अङ्गुल में, ओठ का स्पर्श करे तो छठे अद्भुत में, गाल का स्पर्श करे तो सप्तम अङ्गल में, ठोड़ी का स्पर्श करे तो अष्टम अद्भुत में, कान का स्पर्श करे तो नवम अद्भूत में, गरदन का स्पर्श करे तो दशम अद्भुत में, कन्चे का स्पर्श करे तो एकादश अङ्गुल में, छाती का स्पर्श करे तो बारहवें अङ्गुल में और कोखों का स्पर्श करे तो तेरहवें अङ्गुल में व्रण कहना चाहिये।
स्तन का स्पर्श करे तो चौदहवें अङ्गुल में, हृदय का स्पर्श करे तो पन्द्रहवें अङ्गुल में, पेट का स्पर्श करे तो सोलहवें अङ्गुल में, कुक्षि का स्पर्श करे तो सत्रहवें अङ्गल में, नाभि का स्पर्श करे तो अट्ठारहवें अङ्गल में, नाभि के मूल का स्पर्श करे तो उन्नीसवें अङ्गल में, कटिप्रदेश का स्पर्श करे तो बीसवें अङ्गल में और गुहा स्थान का स्पर्श करे तो इक्कीसवें अङ्गुल में व्रण कहना चाहिये।
ऊरू का स्पर्श करे तो बाईसवें अङ्गल में, ऊरूद्धय के मध्य भाग का स्पर्श करे तो तेईसवें अब्रूस में, जानु का स्पर्श करे चौबीसवें अङ्गुल में और जद्धा का स्पर्श करे तो पच्चीसवें अद्भुत में जण कहना चाहिये।
जङ्घाओं के मध्य भाग का स्पर्श करे तो छब्बीसवें अङ्गुल में, गुल्फ (टखना = पाँव की गांठी) का स्पर्श करे तो सत्ताईसवें अङ्गुल में, एंड़ी का स्पर्श करे तो अट्ठाइसवें अङ्गल में, पाँव का स्पर्श करे तो उन्तीसवें अङ्गल में और पाँव को अङ्गुली का स्पर्श करे तो तीसर्वे अङ्गुल में व्रण कहना चाहिये। यह गर्गाचार्य के मत से कहे गये हैं।
एक आदि अङ्गल में व्रण हो तो क्रम से पुत्रमरण आदि फल कहना चाहिये। जैसे प्रथम अङ्गल में व्रण हो तो पुत्र का मरण, द्वितीय में धन की प्राप्ति, तृतीय में धनहानि, चतुर्व में सम्पत्ति और पडम में बन्धन कहना चाहिये।
षष्ठ आदि अङ्गुल में व्रण हो तो क्रम से सुतलाम आदि फल कहना चाहिये। जैसे छठे अङ्गुल में व्रण हो तो पुत्रलाभ, सातवें में कलह, आठवें में हाथी का लाभ, नवें में पुत्रमरण, दशवें में धनलाभ, ग्यारहवें में विनाश, बारहवें में स्री की प्राप्ति और तेरहवें अङ्गुल में व्रण हो तो मन में दुःख होता है।
यदि चौदहवें अङ्गल में व्रण हो तो लाभ, पन्द्रहवें में हानि, सोलहवें में खोलाभ, सत्रहवें में यप, अट्ठारहवें में वृद्धि, उनीसवें में मरण और बीसवें अंगुल में व्रण हो तो प्रसव्रता होती है तथा इक्कीसवें अंगुल में प्रण हो तो धनहानि होती है।
बाईसवें अंगुल में व्रण हो तो घन का लाभ, तेईसवें में मृत्यु, चौबीसवें में धनलाभ, पच्चीसर्वे में मरण, छब्बीसवें में सम्पत्ति, सत्ताईसवें में निर्धनता, अट्ठाईसवें में ऐश्वर्य, उनतीसवें में मरण और तीसवें अंगुल में व्रण हो तो राज्यलाभ होता है।
तीस अंगुल के बाद विशेष फल नहीं होता, किन्तु सामान्य रूप से विषम अंगुल में व्रण हो तो अशुभ और संम में शुभ फल कहना चाहिये। कोई-कोई (पराशर आदि आचार्य) तीस अंगुल के बाद अप्रभाग तक फलरहित बताते हैं।
करवीर, कमल, हाथी के मद, घृत, कुङ्कुम, कुन्द या चम्पापुष्प के समान सुगन्धि हो तो शुभदायी होता है। गोमूत्र, पङ्क या मेद (हड्डी के अन्तर्गत तैल भाग) की तरह गन्ध हो तो अशुभ फलदायी होता है।
कहुआ, मज्जा, रक्त या क्षार की तरह गन्य हो तो भय और दुःख देने वाला होता है। वैदूर्यमणि, सुवण या बिजली के समान खड्ग में कान्ति हो तो जय, आरोग्य और उनतिकारक होता है।
उत्कृष्ट लक्ष्मी की इच्छा करने वाला अपने शत्र को रुधिर से पान देवे, गुणवान् पुत्रों की इच्छा करने वाले घृत से, अपरिमित धन की इच्छा करने वाले जल से, पाप (बधादि) से अर्थसिद्धि चाहने वाले घोड़ी
ऊंटनी, हथिनी के दूध से और हाथी के शुण्ड काटने की इच्छा बाले ताड़ के रस (जादी) से मिश्रित मछली के पित्त तथा हरिणों, घोड़ी या छाग के दूध से शव को पान देवे ।
शत्र पर तिल का तेल मलने के बाद आक के वृक्ष के गोंद और मेष के सींग के भस्म से मिली हुई कबूतर और चूहे को बोट को उसके ऊपर लेप करे, बाद में तेज करके उससे पत्थर पर भी मारे तो वह नहीं टूटता है।
केले की राख में मठ्ठा मिलाकर उसमें एक अहोरात्र तक लोहे को छोड़ दे, बाद में उसको निकाल कर तेज बन्न, फिर उससे पत्थर या अन्य लोहे पर भी मारे तो वह नहीं टूटता है।
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