नाकारणं विवृणुयात्र विघट्टयेच्च पश्येन्न तत्र वदनं न वदेच्च मूल्यम् । देशं न चास्य कथयेत् प्रतिमानयेन्त्र नैव स्पृशेनृपतिरप्रयतोऽसियष्टिम् ॥
राजा अकारण खड्ग को प्यान से न निकाले, न चलाये, उसमें अपना मुख न देखे, उसकी कीमत न बतावे, उसका उत्पत्तिस्थान न बताये, अङ्गलियों से न नापे और असंयत होकर उसको स्पर्श न करे ।
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