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बृहत्संहिता • अध्याय 50 • श्लोक 16
पुत्रमरणं धनाप्तिर्धनहानिः सम्पदच बन्यच । एकाद्यङ्गुलसंस्थैर्वर्णः फलं निर्दिशेत् क्रमशः ॥
एक आदि अङ्गल में व्रण हो तो क्रम से पुत्रमरण आदि फल कहना चाहिये। जैसे प्रथम अङ्गल में व्रण हो तो पुत्र का मरण, द्वितीय में धन की प्राप्ति, तृतीय में धनहानि, चतुर्व में सम्पत्ति और पडम में बन्धन कहना चाहिये।
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