आर्क पयो हुडुविषाणमधीसमेतं पारावताखुशकृता च युतः प्रलेपः।
शस्त्रस्य तैलमथितस्य ततोऽस्य पानं पश्चाच्छितस्य नै शिलासु भवेद्विघातः ॥
शत्र पर तिल का तेल मलने के बाद आक के वृक्ष के गोंद और मेष के सींग के भस्म से मिली हुई कबूतर और चूहे को बोट को उसके ऊपर लेप करे, बाद में तेज करके उससे पत्थर पर भी मारे तो वह नहीं टूटता है।
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