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बृहत्संहिता • अध्याय 50 • श्लोक 11
शिरसि स्पृष्टे प्रथमेऽङ्गुले द्वितीये ललाटसंस्पर्शे । भ्रूमध्ये च तृतीये नेत्रे स्पृष्टे चतुर्थे च ॥
यदि प्रश्नकर्ता शिर को स्पर्श करे तो खड्ग मूल से प्रथम अङ्गल में, ललाट का स्पर्श करे तो द्वितीय अङ्गुल में, घूमध्य का स्पर्श करे तो तृतीय अङ्गुल में और नेत्र का स्पर्श करे तो चतुर्थ अङ्गुल में व्रण कहना चाहिये।
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