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बृहत्संहिता • अध्याय 50 • श्लोक 22
कूर्मवसासृक्क्षारोपमश्च भयदुःखदो भवति गन्धः। वैदूर्यकनकविद्युत्प्रभो जयारोग्यवृद्धिकरः ॥
कहुआ, मज्जा, रक्त या क्षार की तरह गन्य हो तो भय और दुःख देने वाला होता है। वैदूर्यमणि, सुवण या बिजली के समान खड्ग में कान्ति हो तो जय, आरोग्य और उनतिकारक होता है।
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