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बृहत्संहिता • अध्याय 50 • श्लोक 14
ऊर्वोर्द्वाविंशे स्यादूवॉर्मध्ये व्रणत्रयोविंशे । जानुनि च चतुर्विशे जवायां पञ्चविंशे च ॥
ऊरू का स्पर्श करे तो बाईसवें अङ्गल में, ऊरूद्धय के मध्य भाग का स्पर्श करे तो तेईसवें अब्रूस में, जानु का स्पर्श करे चौबीसवें अङ्गुल में और जद्धा का स्पर्श करे तो पच्चीसवें अद्भुत में जण कहना चाहिये।
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