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बृहत्संहिता • अध्याय 50 • श्लोक 18
लब्धिर्हानिः खीलव्ययो वधो वृद्धिमरणपरितोषाः । ज्ञेयाश्चतुर्दशादिषु धनहानिश्चैकविंशे स्यात् ॥
यदि चौदहवें अङ्गल में व्रण हो तो लाभ, पन्द्रहवें में हानि, सोलहवें में खोलाभ, सत्रहवें में यप, अट्ठारहवें में वृद्धि, उनीसवें में मरण और बीसवें अंगुल में व्रण हो तो प्रसव्रता होती है तथा इक्कीसवें अंगुल में प्रण हो तो धनहानि होती है।
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