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बृहत्संहिता • अध्याय 50 • श्लोक 17
सुतलाभः कलहो हस्तिलब्धयः पुत्रमरणधनलाभौ। क्रमशो विनाशवनिताप्तिचित्तदुः खानि षट्प्रभृति ॥
षष्ठ आदि अङ्गुल में व्रण हो तो क्रम से सुतलाम आदि फल कहना चाहिये। जैसे छठे अङ्गुल में व्रण हो तो पुत्रलाभ, सातवें में कलह, आठवें में हाथी का लाभ, नवें में पुत्रमरण, दशवें में धनलाभ, ग्यारहवें में विनाश, बारहवें में स्री की प्राप्ति और तेरहवें अङ्गुल में व्रण हो तो मन में दुःख होता है।
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