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अध्याय 47 — अथ मयूरचित्रकाध्यायः

बृहत्संहिता
29 श्लोक • केवल अनुवाद
पहले चार (चन्द्रग्रह समागम), युद्ध, मार्ग (शुक्रचार) और आदि (मण्डल) में दिव्य तथा आन्तरिक्ष के आश्रयवश शुभाशुभ फल विस्तारपूर्वक मैंने (वराहमिहिर ने) कहे हैं; फिर उसी फलप्रसङ्ग को लेकर यहाँ कहना संक्षेप करने वाले
वराहमिहिर के लिये ठीक नहीं है; क्योंकि विस्तार करना उनका दोष है। पर यहाँ पुनरुक्त दोष है, ऐसा पण्डितों को नहीं कहना चाहिये। यतः यह बर्हिचित्रक नामक प्रकरण संहिता का प्रसिद्ध अङ्ग है।
पुनरुक्त फेल होने से ही इस मयूरचित्रक का निश्चित स्वरूप ज्ञात होगा अर्थात् पूर्व फल-कथन के अतिरिक्त पुनः यहाँ पर मयूरचित्रक का सम्बन्ध लेकर उसी फल का वर्णन कर देना ही उसका स्वरूप है; अत: फिर नहीं कहने से भी मेरी निन्दा होगी ।
यदि प्रकाशयुत होकर ग्रह उत्तर बोधियों (नाग, गज और ऐरावतसंज्ञक यीथी) में गमन करें तो क्षेम, सुभिक्ष और कल्याण के लिये होते हैं। यदि प्रकाराहीन होकर दक्षिण मार्ग (मृग, अज और दहनसंज्ञक वीथी) में गमन करें तो दुर्भिक्ष, चोरभय और मृत्यु को करते हैं।
यदि कोष्ठागार ( मघा नक्षत्र) में शुक्र और पुष्य नक्षत्र में बृहस्पति स्थित हो तो राजा लोग पारस्परिक द्वेषरहित और सुखी होते हैं तथा प्रजागण प्रसत्र और रोगरहित होते है।
यदि सूर्य को छोड़ कर अन्य ( चन्द्रादि) ग्रह कृत्तिका, मघा, रोहिणी, श्रवणा या ज्येष्ठा नक्षत्र को पीड़ित (दक्षिण मार्ग में गमन या योगतारा के भेदन से पीड़ित करते हो हो अन्याय से पश्चिम दिशा पोदित होती है।
यदि सन्ध्या समय में चन्द्र आदि ग्रह ध्वज की तरह पूर्व दिशा में दिखाई दें तो पूर्व दिशा में स्थित राजाओं में परस्पर विग्रह होता है तथा आकाश-मध्य में स्थित हो तो मध्य देश में पीडा होती है। पर इन चन्द्र आदि ग्रहों के रूखे रहने पर ही यह फल प्राप्त होता है। यदि निर्मल सुन्दर किरण पाले हो तो नहीं अर्थात् पूर्व दिशा या मध्य देश को पीड़ित नहीं करते हैं।
यदि चन्द्र आदि ग्रह दक्षिण दिशा में स्थित हों तो दक्षिण दिशा में मेघों का नाश करते हैं। यदि ये ग्रह अल्प विम्ब वाले और रूक्ष हों तो विग्रह तथा स्थूल बिम्ब वाले किरणयुक्त हों तो शुभ होता है।
यदि चन्द्र आदि ग्रह स्पष्ट किरण बाले होकर उत्तर मार्ग में स्थित हों तो उत्तर दिशा में स्थित राजाओं में शान्ति करने वाले होते हैं। यदि अल्प विम्ब वाल्लल्या भस्म के समान वर्ण वाले हों तो उस दिशा में स्थित राजाओं में दोष उत्पन्न करने वाले होते हैं।
यदि ग्रह और नक्षत्रों के तारे घूमज्याला या अग्निकणों से व्याप्त या विना कारण प्रकाशरहित दिखाई दें तो उस देश में (ग्रहभक्ति या कूर्म विभाग में कथित उस ग्रह या नक्षत्र के देश में) स्थित राजा के साथ-साथ सब प्रजाओं का भी नाश होता है।
५५१ जिस समय आकाश में दो चन्द्रमी दिखाई दें, और शुभ होता है। यदि दो सूर्य दिखाई दें तो क्षत्रियों में संग्राम होता है तथा तीन-चार उस समय शीघ्र ब्राह्मणों की वृद्धि आदि सूर्य दिखाई दें तो संसार का नाश होता है।
यदि केतु सप्तर्षि मण्डल, अभिजित् नक्षत्र, ध्रुवतारा या ज्येष्ठा नक्षत्र को स्पर्श करे तो मेषों का नाश, अमङ्गल, कर्मों की हानि और शोक देने वाला होता है। यदि आश्लेषा नक्षत्र को स्पर्श करे तो निश्वय ही वृष्टि का नाश और क्षुधा-पिपासा आदि से पीड़ित बालकों को साथ लेकर लोग यहाँ से चल कर नष्ट होते हैं।
यदि केतु सप्तर्षि मण्डल, अभिजित् नक्षत्र, ध्रुवतारा या ज्येष्ठा नक्षत्र को स्पर्श करे तो मेषों का नाश, अमङ्गल, कर्मों की हानि और शोक देने वाला होता है। यदि आश्लेषा नक्षत्र को स्पर्श करे तो निश्वय ही वृष्टि का नाश और क्षुधा-पिपासा आदि से पीड़ित बालकों को साथ लेकर लोग यहाँ से चल कर नष्ट होते हैं।
यदि शनि प्राण्द्वार (कृत्तिका आदि सात नक्षत्रों) में विचरण करते हुये वाळी हो जाय तो दुर्भिक्ष, मित्रों में अत्यधिक विरोध और अवृष्टि करता है।
यदि रोहिणी शकट को शनि, मंगल या केतु भेदन करे तो अधिक क्या कहा जाय, सम्पूर्ण विश्व ही अनिष्ट सागर में पड़ कर नष्ट हो जाता है, अर्थात् उस समय अमंगल ही अमङ्गल चारो तरफ दिखाई देते हैं।
जिस समय केतु सदा दिखाई दे या सम्पूर्ण नक्षत्रमण्डल में विचरण करे, उस समय चराचर के साथ सम्पूर्ण जगत् बराबर किये हुये पूर्वर्जित अशुभ फलों का अनुभव करता है।
यदि चन्द्र धनुषाकार होकर रूक्ष और रक्त वर्ण का दिखाई दे तो दुर्भिक्ष और सेनाओं में परस्पर युद्ध का भय करता है तथा इस चन्द्र की ज्या जिस तरफ रहती है, उस उरफ के राजाओं की विजय होती है। गौ के शृङ्ग की तरह शृङ्गा हो तो गौ और धान्यों का नाश करता है तथा प्रज्ज्वलित या धूम की तरह दिखाई दे तो राजाओं के मरण के लिये होता है।
यदि स्निग्ध, स्कूल, समान मृङ्ग वाला, विशाल और उनत होकर उत्तर तरफ नागयोथो में स्थित चन्द्र शुभ ग्रह से देखा जाता हो और पापग्रह से मुठ न हो तो मनुष्यों को अतिशय आनन्द देता है।
यदि चन्द्रमा मघा, अनुराधा, ज्येष्ठा, विशाखा और चित्रा नक्षत्र में जाकर दक्षिण मार्ग में होकर गमन करे तो अशुभ और उत्तर मार्ग या मध्य में होकर गमन करे तो शुभ करने बाला होता है।
सूर्य के उदय या अस्त समय में तिरछी येप की रेखा 'परिच' संज्ञक, प्रतिसूर्य 'परिधि' संज्ञक और स्पष्ट इन्द्रधुं के समान रेखा 'दण्ड' संज्ञक होती है
तथा उदय या अस्त समय में सूर्य के लम्बे किरण 'अमोध' संज्ञक, स्पष्ट इन्द्रधनुष के खण्ड 'रोहित' संज्ञक और लम्बे सीधे इन्द्रधनुष 'ऐरावत' संज्ञक होते हैं।
अर्धास्त सूर्यबिम्ब के अनन्तर स्पष्ट रूप से ताराओं को दिखाई देने तक पश्विमा सन्ध्या और कराओं के प्रकाराहानि के समय से अधोदित सूर्यबिम्ब फाल तक प्राक् सन्ध्या होती है।
इस सध्या समय में वक्ष्यमाणचिकेद्वारा सुभाशुभ फल कहना चाहिये, जैसे कि समस्त अवकाशस्थित विम्बगण स्निग्ध हों तो शीघ्र मर्षा और रूखे हों तो भय उत्पन होता है।
अखण्डित परिष, निर्मल आकाश, सूर्य को श्याम वर्ग किरणें, स्विच दीधिति, ब्रेड वर्ग के इन्द्रधनुष, पूर्वोतरा विद्युत् और स्निग्ध या सूर्य के किरणों में व्याप्त मेघवृध हो तो वर्षा होती है अथवा यदि सायंकाल में बहुत बड़ा मेभ सूर्यविम्भ को आदत करे जो भी मुहि होती है।
जिस देश में खण्डित, कुटिल, कृष्ण, स्वल्प, काक आदि पक्षियों के चिह्नों से व्याप्त या रूक्ष सूर्यविम्ब दिखाई दे तो प्रायः उस देश के राजा काश होता है।
युद्ध की इच्छा करने वाले जिस राजा की सेनाओं के पीछे होकर मांस खाने वाले पढीसमूह गमन करें, उस राजा की सेनाओं को युद्ध से भागना पड़ता है एवं यदि पक्षी गण सेनाओं के आगे होकर गमन करें तो विजय होती है।
सूर्य के उदय या अस्त समय में पताकायुत गन्धर्व नगर की प्रतिमा सूर्यबिम्ब को छादित करे तो राजा को भयङ्कर युद्ध की प्राप्ति होगी- ऐसा कहना चाहिये।
यदि सन्ध्याकाल में सूर्य के विरुद्ध दिशा में मुख करके पक्षीगण और जङ्गली पशु- मधुर शब्द करें तथा निर्मल थोड़ी वायु चले तो शुभ होता है। यदि पूलियों से गण व्याप्त, रूक्ष और लोहित वर्ण की सन्ध्या दिखाई दे तो देशों का नाश होता है।
गर्ग आदि मुनियों ने विस्तारपूर्वक जिन विषयों को बड़ा है, पुनरुक्त दोष रहते उन सब विषयों को इस मयूरचित्र नामक अध्याय में मैंने कहा है। इतने पर भी यदि दुर्जन गण बोलते हो रहे से मेरी क्या हानि है? क्योंकि कोयत के शब्द मुस्कर थी जो भाक शब्द करता है, यह स्वाभाविक शब्द होता है, न कि कोपल को जोड़ने की से।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
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